आओ प्रगति करें, अपना अधिकार जाने !
मानव अधिकार
(पहले यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154 में था।)
🔹 संज्ञेय अपराध क्या है?
ऐसा अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और स्वयं जांच शुरू कर सकती है।
जैसे –चोरी , हत्या, बलात्कार, डकैती, अपहरण आदि।
🔹 FIR कैसे दर्ज कराएं?
निकटतम थाने में जाएँ
घटना की पूरी जानकारी दें (तारीख, समय, स्थान, आरोपी का नाम ,पता आदि)
पुलिस आपकी बात लिखेगी
लिखित रिपोर्ट को पढ़ें
सही होने पर हस्ताक्षर करें
FIR की कॉपी निःशुल्क लें (यह आपका अधिकार है)
🔹 अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो?
संबंधित थाना प्रभारी से लिखित शिकायत दें
पुलिस अधीक्षक (SP) को आवेदन दें (BNSS धारा 173(4))
मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकते हैं (धारा 175 BNSS के तहत आदेश हेतु)
🔹 Zero FIR क्या है?
यदि अपराध किसी अन्य थाना क्षेत्र में घटित हुआ हो, और आप किसी दूसरे थाने में रिपोर्ट दर्ज करा रहे हैं ऐसी स्थिति में FIR जीरो में दर्ज होगा । और बाद में वह रिपोर्ट संबंधित थाने को भेज दी जाती है। इसे Zero FIR कहते हैं।
🔹 FIR का महत्व (Exam Point – LLB के लिए)
आपराधिक प्रक्रिया की शुरुआत FIR से होती है
यह साक्ष्य का महत्वपूर्ण दस्तावेज है
FIR में देरी होने पर अदालत संदेह कर सकती है
FIR substantive evidence नहीं है, लेकिन corroborative evidence के रूप में उपयोग होती है
F.I.R.First Information Report क्या है?
First Information Report (FIR) वह पहली सूचना होती है जो किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के होने पर पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज की जाती है। यह रिपोर्ट लिखित या मोखिक हो सकता है किन्तु थाने में अंतर्गत धारा 173 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत पंजीबद्ध कर रिपोर्ट करने वाले प्रार्थी को पावती दी जाती है
FIR की कानूनी आधार
FIR का प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 में किया गया है।
(पहले यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154 में था।)
🔹 संज्ञेय अपराध क्या है?
ऐसा अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और स्वयं जांच शुरू कर सकती है।
जैसे –चोरी , हत्या, बलात्कार, डकैती, अपहरण आदि।
🔹 FIR कैसे दर्ज कराएं?
निकटतम थाने में जाएँ
घटना की पूरी जानकारी दें (तारीख, समय, स्थान, आरोपी का नाम ,पता आदि )
यदि आप पढे लिखे हैं तो लिखित में आवेदन पत्र थाना प्रभारी को दें
पुलिस आपकी बात अपने पंजी(रजिस्टर में) या कम्प्यूटर में लिखेगी
लिखित रिपोर्ट को पढ़ें
सही होने पर हस्ताक्षर करें
FIR की कॉपी निःशुल्क लें (यह आपका अधिकार है)
🔹 अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो?
संबंधित थाना प्रभारी से सीनियर अधिकारी ACP/डीएसपी/sdop/CSP को लिखित शिकायत दें इसके बाद भी कार्यवाही न होने पर
पुलिस अधीक्षक (SP) /कमिश्नर ऑफ police को आवेदन दें (BNSS धारा 173(4)
शिकायत की प्रतिलिपि अध्यक्ष राज्य मानव अधिकार आयोग को भी सकते हैं
इसके बाद भी कार्यवाही नहीं होती है तो प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन वकील से आवेदन पत्र तैयार करा कर आवेदन कर सकते हैं (धारा 175 BNSS के तहत आदेश हेतु)
ध्यान रहे क्रम वार आगे जाएं, और जहां भी जाएं आवेदन करें उसकी एक फोटो कॉपी अवश्य रखें, यदि रजिस्टर्ड डाक से आवेदन भेजते हैं तो उसकी पावती अच्छे से रखें।
आप ऑनलाइन भी थाना प्रभारी को मेल से भेज सकते हैं किंतु ध्यान रहे जब भी आप ऑन लाइन दर्ज कराते है तो 03 दिवस के अंदर आपको थाना जाना है और हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी करनी है।
🔹 Zero FIR क्या है?
यदि अपराध किसी अन्य थाना क्षेत्र में घटित हुआ हो, और आप किसी दूसरे थाने में रिपोर्ट दर्ज करा रहे हैं ऐसी स्थिति में FIR जीरो में दर्ज होगा । और बाद में वह रिपोर्ट संबंधित थाने को नम्बरिंग हेतु भेज दी जाती है। इसे Zero FIR कहते हैं।
🔹 FIR का महत्व (Exam Point – LLB के लिए)
आपराधिक प्रक्रिया की शुरुआत FIR से होती है
यह साक्ष्य का महत्वपूर्ण दस्तावेज है
FIR में देरी होने पर अदालत संदेह कर सकती है
FIR substantive evidence नहीं है, लेकिन corroborative evidence के रूप में उपयोग होती है
